न जाने कौन सा भ्रम है कि फूलों सी पालने के बाद भी मां-बाप अपनी बेटियों को विदेश ब्याह देते हैं.
इतनी ख़बरें रोज़ आती हैं कि इन बेटियों को विदेशों में जाने क्या-क्या सहना पड़ता है और मां-बाप हैं कि चाह कर भी अपने कलेजे के टुकड़े के लिए कुछ नहीं कर पाते.
सरकारों और कानूनों के सहारे रिश्ते भी चला करते हैं क्या !
भौतिकता व कथित समाजिक सम्मान पर ममता कब पार पाएगी ?
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