राम लाल री राम राम जी,

Wednesday, May 12, 2010

मज़ाकिया फ़तवे

वह भी ज़रूर एक समय रहा होगा जब भाषाई ज्ञान की सीमाओं के चलते पवित्र क़ुरान को पढ़ने-समझने समझने वाले बहुत कम लोग रहे होंगे. उस समय, भाषा के जानकार मुल्ला-क़ाजी अपनी समझ के अनुसार इसके अर्थ आम लोगों को बताया करते थे. आज समय बदल गया है, मुल्ला-क़ाजियों के अलावा भी अनगिनत भाषाविद् हैं जो कुरान को कहीं बेहतर पढ़ और समझ सकते हैं.


ऐसे में अच्छा होगा कि फ़तवे ज़ारी करने वाले मेहरबान लोग, फ़तवों के साथ यह भी बता दिया करें कि क़ुरान में ठीक फ़लां जगह यह लिखा है ताकि उनके फ़तवों की पुष्टी की जा सके.


यही हाल एक समय संस्कृत जानने वालों का था, जो आम हिन्दुओं को उनके धर्मग्रंधों  के  ऐसे अर्थ बताते थे जिनसे उनका अपना उल्लू सीधा होता हो. लेकिन आज उनकी कोई नहीं सुनता.  मुस्लिम समुदाय को भी इस्लाम के इन अनुवादकों के बारे में आज गंभीरता से सोचना होगा.
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रेडि‍यो टीवी से दुनि‍या का पता चलता रहता है. कभी कभी अख़बार मि‍ल जाता है तो वो भी पढ़ लेता हूं.