राम लाल री राम राम जी,

Sunday, March 14, 2010

बाबाओं की बन आई है आजकल

पिछले कुछ समय से कोई न कोई बाबा किसी न किसी कांड में फंसता चला आ रहा है. चाहे वह नकली बाबा का पर्दाफ़ाश हो या भगदड़ में मौतें या काला जादू हो या फिर आतंकियों से सांठ-गांठ.


इन सबके चलते एक बात तो तय है कि उन लाखों सच्चे सन्यासियों से भी लोगों का विश्वास उठने लगा है जो जीवन पर्यंत लोक व परलोक दोनों ही के उत्थान में लगे रहते आए हैं.


मीडिया को संयम से काम लेना चाहिये. पोनी-टेल वाले सेनसेशनलियों को बढ़ावा देने से पहले सोचना चाहिये कि क्या पांचों उंगलियां ही बराबर होती हैं ! विज्ञापन लेने के और भी हज़ार रास्ते हैं.
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3 comments:

  1. सांच को आंच क्या?

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  2. आजकल बाबाओं की ग्रहचाल कुछ ठीक नहीं चल रही :-)
    बाकि जब समाज का सम्पूर्ण ढाँचा ही विकृ्त हो चुका है तो बाबा लोग भी भला कहाँ बच सकते थे..हाँ ये जरूर है कि चन्द लोगों की करणी का फल बाकी समाज को भी भोगना पडता है ओर सच्चे लोगों को भी सन्देह की नजर से देखा जाने लगता है!

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  3. बाबाओं के दिन ठीक नहीं चल रहे हैं...

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रेडि‍यो टीवी से दुनि‍या का पता चलता रहता है. कभी कभी अख़बार मि‍ल जाता है तो वो भी पढ़ लेता हूं.